आदते जो बदली जा सकती है

सुरेश नाम का एक आदमी था। वह शादीशुदा था। उसकी पत्नी का नाम गीता था। उनके दो बच्चे थे। एक बेटा जिसका नाम सुशांत था। एक बेटी जिसका नाम प्रिया था। दोनों बच्चों को उन्होंने बहुत अच्छे से पाला -पोसा था। उन्होंने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए थे। समय के चलते उनके बच्चे शादी के योग्य हो गए। सुरेश और गीता ने अपने बच्चों की शादी कर दी। शादी के बाद बेटी ससुराल चली गई। बेटा नौकरी करता था तो शहर से बाहर रहता था। वह अपने माता-पिता से मिल भी नहीं पाता था क्योंकि उसकी पत्नी उसके माता-पिता से उसको मिलने नहीं देती थी। सुशांत के माता-पिता बहुत दुःखी  रहने लगे। उन्हें  कठिन भावनात्मक और आर्थिक परिस्तिथियों का सामना करना पड़ा। 
                      एक दूसरे को बेहतर तरीके से जानने के लिए माता- पिता और बच्चों का संवाद होना बहुत जरुरी होता है। संवाद होने  से  बच्चे अपने  माता-पिता को और माता-पिता अपने  बच्चों को अच्छे से समझ पाते हैं और दूरियां नहीं बनती। जब सुशांत के माता-पिता को सुशांत की जरुरत थी तब सुशांत ने उनका साथ नहीं दिया या उनके साथ नहीं रहा। उस समय सुशांत उनसे दूर शहर में रहता था। माता-पिता से दूर रहने के कारण वह अपने माता-पिता को अच्छे से समझ नहीं पाया।       
                      एक दिन  माता-पिता दुःखी रहने के कारण ये सोचने लगे कि  एक समय था जब हम दूसरे लोगों का सहारा हुआ करते थे। अब जब हमारा समय आया तो हमारा कोई सहारा नहीं है। हमारी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं हैऔर न ही इतने पैसे हैं की हम अपना खर्चा चला सकें। काश !हम बच्चों पर सारा पैसा खर्च न करते। कुछ पैसे अपने लिए बचा कर रखते तो शायद आज हम अपनी ज़िन्दगी अच्छे से जी पाते या गुज़ार पाते। हमें  ये दुःख तो नहीं देखने पड़ते। चाहे हमारे बच्चे कितने भी अच्छे हों लेकिन फिर भी आगे की ज़िन्दगी के लिए सहारा बनाके रखना चाहिये या पैसे बचाकर रखने चाहिए या पैसों  को  ऐसी वस्तु पर इस्तेमाल करना चाहिए जब हमें जरुरत हो तो उस वस्तु के द्वारा हम अपनी जरूरतों  को  पूरा  कर सकें। इसलिए पैसों  को सोच समझकर  खर्च करें।   कहानी तो  वही पुरानी है पर क्या  यह संभव  है कि अपनी  खुशियों को  छोड़कर , जो आज है उसे छोड़ कर अपने भविष्य के लिए जमा करें। 
                    हाँ ,यह संभव है। उसके लिए हमे बहुत ज्यादा बदलाव की आवश्यकता नहीं है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सोच का होगा और कुछ आदतें बदलनी होंगी। इसके लिए हमें अपने दैनिक खर्चों पर ध्यान देना होगा। इससे आपको कुछ समय में यह पता चलेगा कि किस खर्चे को कम किया जा सकता है,किस खर्चे को बंद किया जा सकता है और कौन सा खर्च अति आवश्यक है। यह प्रक्रिया सतत की है। इससे आपको अपने खर्चों को व्यवहारिक करने में मदद मिलेगी। अब आप अपने भविष्य के लिए छोटी-छोटी राशि निकाल कर बचत कर पायेंगे। जो कालांतर में आपके काम आएगी। इसका उपयोग आप अपनी वृद्धावस्था में मतौर पेंशन में कर सकते हैं। 

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